Wednesday, December 29, 2010
Saturday, December 25, 2010
ग़ज़ल- कुछ नये शेर
अब वहाँ जाकर के जिया जाएगा
जहाँ ज़िक्र तुम्हारा किया जाएगा.
हथेली की लकीरों पे भरोसा क्या करना
किस्मत का लिखा भी बदल दिया जाएगा.
इन उसूलों में भी अब वो समझ ना रही
ख़ुद उसूलों की तरह निभ लिया जाएगा.
खेल हवाओं के संग ही अच्छा होता है
खुद को हार के ही जीत लिया जाएगा.
जहाँ ज़िक्र तुम्हारा किया जाएगा.
हथेली की लकीरों पे भरोसा क्या करना
किस्मत का लिखा भी बदल दिया जाएगा.
इन उसूलों में भी अब वो समझ ना रही
ख़ुद उसूलों की तरह निभ लिया जाएगा.
खेल हवाओं के संग ही अच्छा होता है
खुद को हार के ही जीत लिया जाएगा.
Wednesday, December 22, 2010
धर्म
जिस जगह मैं रहता हूँ
रोज़ सुबह अज़ान की आवाज़ सुनाई देती है
अल्लाह की याद आ जाती है
इधर मेरा धर्म बोलता है
रोज़ मंदिर क्यूँ नही चले जाते
लेकिन मुझे कोई याद ही नही दिलाता
मेरे गुरु बोलते हैं
बहुत जल्द ईसा मसीह आने वाले हैं धरती पर
फिर ये दुनिया बदल जाएगी
लेकिन कब तक
उसका कुछ पता नही है
बहुत धर्मों का बोलबाला है यहाँ
मैं जानता हूँ तुम्हें भी एक मौका चाहिए.
फिर तुम भी उपदेश दिया करोगे
और मैं सुन नही पाऊँगा !
अक्षय बाफिला।
रोज़ सुबह अज़ान की आवाज़ सुनाई देती है
अल्लाह की याद आ जाती है
इधर मेरा धर्म बोलता है
रोज़ मंदिर क्यूँ नही चले जाते
लेकिन मुझे कोई याद ही नही दिलाता
मेरे गुरु बोलते हैं
बहुत जल्द ईसा मसीह आने वाले हैं धरती पर
फिर ये दुनिया बदल जाएगी
लेकिन कब तक
उसका कुछ पता नही है
बहुत धर्मों का बोलबाला है यहाँ
मैं जानता हूँ तुम्हें भी एक मौका चाहिए.
फिर तुम भी उपदेश दिया करोगे
और मैं सुन नही पाऊँगा !
अक्षय बाफिला।
Monday, December 20, 2010
एक खिड़की चाहिए
मैं नही माँगता हूँ
ट्यूब लाइट की चकाचोंध
इस शहर में
ये झोपड़ी ही मेरा बँगला है,
तुम देखना
इस बंगले में लगे बल्ब
जो जलते ही नहीं हैं,
एक दिन
तुम्हारे शहर में उजाला करेंगे,
मुझे झाँकने के लिए
बस एक खिड़की चाहिए.
Friday, December 10, 2010
त्रिवेणी
ऐसे खटखटाते हैं रात के सन्नाटे
जैसे ख्वाब के सब दरवाज़े टूट जायेंगे
और तुम चले जाओगे सहर से पहले.
जैसे ख्वाब के सब दरवाज़े टूट जायेंगे
और तुम चले जाओगे सहर से पहले.
Wednesday, December 1, 2010
एक नज़्म की कोशिश - वज़ूद
ढूँढते ढूँढते एक नज़्म के मानिंद
मिल ही जाती हो तुम
तुम्हारा वज़ूद है के
एक सफ़हे में सिमट जाता है
मैं कैसे कहूँ के ये तू नहीं
ये गुफ्तगू तेरे रूबरू नहीं
क्या सबब हो के तुम हो कोरे पन्ने में
वक़्त लगता है इंसान को खुदा बनने में
तुम तो अब भी रूठे नज़र आते हो
तुम्हारा एहतियात है जो
वो है फ़न मेरा,
एक फ़नकार से पूछते हो
जूस्तजू क्या है ?
के सिमट आई है देखो
हर तरफ से हवा
तुम्हारा वज़ूद है के एक
सफ़हे में सिमट जाता है.
मानिंद - तरह
सफ़हे - पन्ने
अक्षय बाफिला
मिल ही जाती हो तुम
तुम्हारा वज़ूद है के
एक सफ़हे में सिमट जाता है
मैं कैसे कहूँ के ये तू नहीं
ये गुफ्तगू तेरे रूबरू नहीं
क्या सबब हो के तुम हो कोरे पन्ने में
वक़्त लगता है इंसान को खुदा बनने में
तुम तो अब भी रूठे नज़र आते हो
तुम्हारा एहतियात है जो
वो है फ़न मेरा,
एक फ़नकार से पूछते हो
जूस्तजू क्या है ?
के सिमट आई है देखो
हर तरफ से हवा
तुम्हारा वज़ूद है के एक
सफ़हे में सिमट जाता है.
मानिंद - तरह
सफ़हे - पन्ने
अक्षय बाफिला
Monday, November 29, 2010
sms - ना जाने कितनी शिकायतों से भरा रहता था तेरा ख़त जैसे कोई नज़्म बाँध के मेरे कलेजे में चिपका दी हो तुमने
वो दौर था जब तुम ख़त लिखा करती थी
तुम्हारे ख़त में लिखे शब्दों से मैं
तुम्हारे हाथों की छुवन को महसूस कर लिया करता था
कभी कभी तुम्हारे आँसू के धब्बे
ख़त में स्याही बिखेर देते थे
मैं समझ जाता था तुम रोई होगी
मुझे याद करके
ना जाने कितनी शिकायतों से भरा रहता था तेरा ख़त
जैसे कोई नज़्म बाँध के मेरे कलेजे में चिपका दी हो तुमने
आजकल तुम sms foward कर देती हो
अच्छा नही लगता है.
अक्षय बाफिला।
तुम्हारे ख़त में लिखे शब्दों से मैं
तुम्हारे हाथों की छुवन को महसूस कर लिया करता था
कभी कभी तुम्हारे आँसू के धब्बे
ख़त में स्याही बिखेर देते थे
मैं समझ जाता था तुम रोई होगी
मुझे याद करके
![]() |
| sms |
जैसे कोई नज़्म बाँध के मेरे कलेजे में चिपका दी हो तुमने
आजकल तुम sms foward कर देती हो
अच्छा नही लगता है.
अक्षय बाफिला।
Thursday, November 18, 2010
मेरे गाँव की कमी है
मेरे गाँव की कमी है
के वो शहर नही है
वहाँ सड़कों पर रेड लाइट नही है
और चहल पहल नही है,
हाँ! ये मेरे गाँव की कमी है
मेरे गाँव में पेड़ों के हैं जंगल
जहां साँस लेती है ज़ॅमी
जहाँ जानवर जीते हैं
अपने हौसलों के साथ
मेरे गाँव में पत्थरों के जंगलों की कमी है
मकान तो हैं मगर
फ्लेट ही नहीं हैं
ये मेरे गाँव की कमी है.
जवान हौसलों में अब सीमेंट लग चुका
बन गई दीवारें ईंट ढक चुकी
जो पल रही थी जिंदगी
वो शहर को गयी
खा के दाना पानी गाँव का
शहर को गयी.
नौकर बनने का रिवाज़
अब भी चल रहा
मेरे गाँव में तो नौकरी भी नही है
ये मेरे गाँव की कमी है
वो शहर नही है
मेरे गाँवकी कमी है.
शायद, ख़याल, सोज़, तमन्ना और है.
शायद, ख़याल, सोज़, तमन्ना और है
मेरी ज़िंदगी का एक पन्ना और है.
ओढूं मैं क्यौ नकाब गुनहगार मैं नहीं,
मेरा ख़्याल हैं के मुझे बनना और है.
रूह-ए-अदा की रौनके महफूज़ तो करूँ,
चेहरे की झुर्रियों की तमन्ना और है.
दिल का जवाब आप से मुख़ातिब नही हुआ,
मेरा ख्याल है के संभलना ज़रूर है.
वक़्त यूँ चलता रहा चल रहा यूँ नसीब,
काँटों की रहगुज़ार में छालों का दौर है.
Monday, September 13, 2010
है ना माँ !
माँ याद है मुझे जब मैं बाल्टी के साइज़ का हुआ करता था,
मेरा एक हाथ बाल्टी में और दूसरा हाथ तेरे कंधे पे हुआ करता था,
तू गुनगुने पानी से नहलाया करती थी मुझे झूठी बातों का लालच देकर,
और मैँ लालची , लालच में आ भी जाता था.तेरी गोद में मुझे सारा जहाँ नज़र आता था,
तेरी लोरियाँ मेरी नींदें हुआ करती थीऔर मेरी नींदों में भोले भाले सपने,
जाने कहाँ गया वो सब,
समय बहुत लालची है माँ
बदल दिया मुझे,
अब मैं बाल्टी के साइज़ का नही रहा
लेकिन तू अब भी वही है,
है ना माँ !
अक्षय बाफिला
Thursday, August 26, 2010
नज़्म - वज़ूद
ढूँढते ढूँढते एक नज़्म की मानिंद
मिल ही जाती हो तुम
तुम्हारा वज़ूद है के
एक सफ़हे में सिमट जाता है,
में कैसे कहूँ के ये तू नहीं,
ये गुफ्तगू तेरे रूबरू नहीं.
क्या सबब हो के तुम हो कोरे पन्ने में,
वक़्त लगता है इंसान को खुदा बनने में.
तुम तो अब भी रूठे नज़र आते हो,
तुम्हारा एहतियात है जो
वो है फन मेरा
के जूस्तजू क्या है ?
के सिमट आई है देखो
हर तरफ से हवा
तुम्हारा वज़ूद है केएक सफ़हे में सिमट जाता है.
वक़्त-बे-वक़्त
1 - तुम यूँ ही गुज़र जाते हो , तुम जब भी ठहर जाते हो.
मैं तेरी बाहों में जीने की कोशिश में, वक़्त से यूँ ही लड़ता रहता हूँ.
16 - मुझे भी हक़ देना के कुछ अल्फ़ाज़ मेरे हों
कई लोगों ने लूटा है मेरी चुप्पी का दम लेकर'
17 - ना नींद आती है ना सुकून होता है,
शायद ऐसा ही कुछ, जुनून होता है।
40 - झिलमिलाती है बूँद पत्तों में ,
ज्योतिष् बहुत नाराज़ है .
मैं तेरी बाहों में जीने की कोशिश में, वक़्त से यूँ ही लड़ता रहता हूँ.
2 - माँ ने सोचा था के सहारा होगा,
बच्चा बुढ़ापे का गुज़ारा होगा ,
बचपना है के गुज़रता ही नही है.
3 - कोई आवाज़ लगाता है हमें भरे हल्ले में,
यूँ उजाला है, हमने वहाँ पाला है .
3 - तुम ले गये थे अपना सारा सामान ,
बीते वक़्त का अब में क्या करूँ..
4 - आओ मिलकर घड़ी की सुई रोक लें,
वक़्त बहुत बुरा है जो गुज़र रहा है.
5 - मासूमियत का ढोंग बेहतर ही होना चाहिए,
पूंछ हिलाते कुत्ते से कुछ तो बेहतर हो तुम.
6 - बाँवरे मन की तलब है, अब कुछ कर गुज़र जाना पड़ेगा .
वक़्त मेरा आना चाहिए , वरना वक़्त को ठहर जाना पड़ेगा .
7 - मैं ख्वाब देखता आया हूँ, मैने ख्वाब सजाना सीख लिया.
मैं हारूँगा अब क्यों बाज़ी , मैने जीत को पाना सीख लिया
8 - अपनी बाहों में समा जाएगा ये आसमान,
कुछ बुलंदियों से यूँ गुफ्तगू की है.
9 - सोच से परे कुछ सोचा है ,
आज उम्मीदों से फिर एक जंग हुई.
10- बहुत सस्ता कर देते हैं लोग अपनी कुछ गंदी कीमतों से,
मेरा सामान भी अब मेरा रहने नही देते.
11 -जिस एक ख्वाब का सौदा तुम्हारे लिए किया है,
सुना है उस रोज़ कोई रात नही होगी.
12 - हाँ नमी में भी कमी होती है ,
शबनमी पत्तों से पूछा था कभी.
13 - बहुत डर लगता है किसी के नज़दीक होने में,
हो सके तो दूरियों से भी फासला रक्खा जाए .
14 - बहुत समझा दुनिया को,
बहुत समझाया दुनिया वालों ने.
बहुत समझाया दुनिया वालों ने.
15 - ये जो एहसास होते हैं , बहुत खामोश होते हैं
इन्हें खामोश रहने दो , ये बहुत ही ख़ास होते हैं।
इन्हें खामोश रहने दो , ये बहुत ही ख़ास होते हैं।
16 - मुझे भी हक़ देना के कुछ अल्फ़ाज़ मेरे हों
कई लोगों ने लूटा है मेरी चुप्पी का दम लेकर'
17 - ना नींद आती है ना सुकून होता है,
शायद ऐसा ही कुछ, जुनून होता है।
18 - कभी कभी सही होना भी बहुत ग़लत होता है
23 - मुझे माफी दे सको तो दे देना
25 - वो ज़रूरत की बात करते हैं
मुझे सच्चाई बहुत पसंद है ।
19 - उड़ान मेरे परिंदों की भी कुछ नज़र कर लो
के फ़ैसले बदलते कुछ देर नही लगती ।
19 - उड़ान मेरे परिंदों की भी कुछ नज़र कर लो
के फ़ैसले बदलते कुछ देर नही लगती ।
20 - ना तू होता ना तेरी चाह होनी थी
बिना मंज़िल की इक तन्हा राह होनी थी।
21 - गुमशुदा सी एक तलाश के लिए
ये लड़ाई भी ख़त्म हो जाएगी.
22 - जो सिखाया तुमने मुझे मैं वो ही करता गया ,
मैं नही बदला तुम्हारी तरकीबें ही बदल गयी.
21 - गुमशुदा सी एक तलाश के लिए
ये लड़ाई भी ख़त्म हो जाएगी.
22 - जो सिखाया तुमने मुझे मैं वो ही करता गया ,
मैं नही बदला तुम्हारी तरकीबें ही बदल गयी.
अब मेरी ग़लतियाँ ही मेरी सफाई है.
24 - मैं सोचता हूँ के तुम क्या सोचते होगे
मैं वही सोचता हूँ जो तुम सोचते होगे .
मैं हक़ीकत में उलझ जाता हूँ.
26 - ना समझो तुम मुझे तो ये ही बेहतर है,
जान भी गये तो मैं अब भी वही हूँ ।
27 - ना बदल जाऊं कहीं ये भी डर होता है
आजकल हालातों में बहुत असर होता है .
28 - बस यही गुनाह हुआ जाता है, हर आदमी आम हुआ जाता है.
यहाँ ख़ास वो लोग हुआ करते हैं,चोरी का काम जिसे आता है ।
29 - बेरहम हुए भी तो क्या हुए
रहम तो तुमपे किया जाना था
30 - खुद को यूँ भी कभी उल्लू बनाया जाए
जब जी ना लगे तो लगाया जाए .
31 - हाँ अब मैं ग़लत होने चला हूँ
सच को सच बोलने चला हूँ
32 - तुम्हारा दुख मैं समझता हूँ
मेरी खुशी से तुम नाराज़ तो नहीं ।
33 - मैं कभी गुमशुदा भी हो सकता हूँ
जान पहचान ज़्यादा अच्छी नही होती ।
34 - दोस्त हम भी बनाने निकले ,
दुश्मनों को आज़माने निकले ।
35 - कुछ किनारे इस दरिया के बहे जायेंगे ,
सुना है शोर बहुत दूर तलाक़ जाएगा ।
36 - कौन पढ़ेगा मेरे अंदर छिपी हुई इस किताब को,
जलने से पहले मैं इसे खुद ही निपटा लूँ ।
37 - जो सहा मेरे बुज़ुर्गों ने मुझे उसकी सज़ा अता कर
कर जो भी कर ए ख़ुदा कर मुझको बता कर ।
38 - धुंध ही धुंध चारों तरफ़ दिखाई देती है ,
ख़ुमार सर्दियों के लहज़े बात करता है ।
39 - ख़याल ख़यालों से टकराए चूर हो गये
कुछ हादसे होने को मज़बूर हो गये.
27 - ना बदल जाऊं कहीं ये भी डर होता है
आजकल हालातों में बहुत असर होता है .
28 - बस यही गुनाह हुआ जाता है, हर आदमी आम हुआ जाता है.
यहाँ ख़ास वो लोग हुआ करते हैं,चोरी का काम जिसे आता है ।
29 - बेरहम हुए भी तो क्या हुए
रहम तो तुमपे किया जाना था
30 - खुद को यूँ भी कभी उल्लू बनाया जाए
जब जी ना लगे तो लगाया जाए .
31 - हाँ अब मैं ग़लत होने चला हूँ
सच को सच बोलने चला हूँ
32 - तुम्हारा दुख मैं समझता हूँ
मेरी खुशी से तुम नाराज़ तो नहीं ।
33 - मैं कभी गुमशुदा भी हो सकता हूँ
जान पहचान ज़्यादा अच्छी नही होती ।
34 - दोस्त हम भी बनाने निकले ,
दुश्मनों को आज़माने निकले ।
35 - कुछ किनारे इस दरिया के बहे जायेंगे ,
सुना है शोर बहुत दूर तलाक़ जाएगा ।
36 - कौन पढ़ेगा मेरे अंदर छिपी हुई इस किताब को,
जलने से पहले मैं इसे खुद ही निपटा लूँ ।
37 - जो सहा मेरे बुज़ुर्गों ने मुझे उसकी सज़ा अता कर
कर जो भी कर ए ख़ुदा कर मुझको बता कर ।
38 - धुंध ही धुंध चारों तरफ़ दिखाई देती है ,
ख़ुमार सर्दियों के लहज़े बात करता है ।
39 - ख़याल ख़यालों से टकराए चूर हो गये
कुछ हादसे होने को मज़बूर हो गये.
40 - झिलमिलाती है बूँद पत्तों में ,
अब अब्र को सब्र कहाँ होगा.
41 - सुखद अनुभव ,स्वच्छ तपस्या , विरह मेरे अपनों का ,
दुखद पीड़ा , निर्मोह बंधन ,व्यथा सब कुछ कहती है.
42 - कभी तो कोई वज़ह मिलेगी ,
कभी तो बेवज़ह मिला करो .
43 - कुछ लोग जले भुने से ग़लत आग मैं लिपटे हैं ,
44 - खामोश हूँ पर बोल रहा हूँ ,
खुद से खुद को तोल रहा हूँ.
वो चिंगारी ये कहती है मेरा मकसद तो साफ़ था .
44 - खामोश हूँ पर बोल रहा हूँ ,
45 - रास्ते के पत्थर हैं ठोकर सम्हाले हुए ,
इस सफ़र से उम्मींदें और ज़्यादा हो गई .
46 - उमंगों की बौछार लिए इस पल को गीला गीला कर ,
आसमान तो नीला हैं इस धरती को भी नीला कर। :)
47 - ये जो ख्वाब हैं अजाब हैं , ये मुफ़लिसी के हिसाब हैं .
ये दौर-ऐ-जहां का है फलसफा , ये फैसले हैं फसाद है ।
48 - रास्ते गुमराह जब करने लगे तुझको कभी ,
तुझको मंज़िल का ठिकाना और भी आसां लगेगा ।
49 - कितने रिश्तों को समझाऊं मैं ,
अब किस-किस का बन जाऊं मैं .
क्या जश्न यही है जीवन का ?
इक प्रश्न यही है जीवन का .
कितने हिस्सों मैं बँट जाऊं मैं ?
अब किस किस का बन जाऊं मैं .
50 - अपने साए को सम्हाले रखना ,
47 - ये जो ख्वाब हैं अजाब हैं , ये मुफ़लिसी के हिसाब हैं .
ये दौर-ऐ-जहां का है फलसफा , ये फैसले हैं फसाद है ।
48 - रास्ते गुमराह जब करने लगे तुझको कभी ,
तुझको मंज़िल का ठिकाना और भी आसां लगेगा ।
49 - कितने रिश्तों को समझाऊं मैं ,
अब किस-किस का बन जाऊं मैं .
क्या जश्न यही है जीवन का ?
इक प्रश्न यही है जीवन का .
कितने हिस्सों मैं बँट जाऊं मैं ?
अब किस किस का बन जाऊं मैं .
50 - अपने साए को सम्हाले रखना ,
ये भीड़ अभी लोगों की जानी बाकी है .
51 - मुझे ग़लत कह तो लेता था मगर साबित ना कर पाया,
मैं सच कहता था वो कभी ना बदलेगा .
52 - मैं ना ठहरता तो तुम भी नही रुकते,
जाने क्यों एक वज़ह बहुत लाज़मी हो गयी.
53 - लम्हे मुझे रोक लेते हैं,
और पूछते हैं मुझसे बच कर कहाँ जाएगा?
बस उसी मुकाम की तलाश अभी बाकी है.
54 - कई रातों से नींद नही आती है ,
खूब ख़्वाबों को थपकीयाँ दे के सुलाया मैने .
55 - सिलवटें उस तस्वीर को बयान कर रही थी ,
एक तक़दीर की लड़ाई में वो तरकीब भी गयी ।
56 - मैं लड़ रहा था तुम जीत रहे थे ,
लम्हे बेवज़ह बीत रहे थे ।
56 - मैं लड़ रहा था तुम जीत रहे थे ,
लम्हे बेवज़ह बीत रहे थे ।
57 - मुझे तूफ़ान से लड़ना है ,
समंदर अब अच्छा लगता है
58 - जब लकीरें असरदार थी
तो किस्मत से झगड़ा था ,
अब किस्मत बदल रहा हूँ तो ,तो किस्मत से झगड़ा था ,
ज्योतिष् बहुत नाराज़ है .
59 - सफ़र वही है तरीके बदल गये ,
मंज़िलें अब मेरे मोड़ पर ही मुड़ती है .
60 - गीली रात में कुछ ख्वाब निचोड़ के रखे हैं ,
सुखते सुखते हो सकता है सुबह हो जाए .
61 - सिलवटें उस तस्वीर को बयाँ कर रही थी ,
एक तक़दीर लड़ाई में वो तरकीब भी गयी ।
62 - खुश रहें हम , खुश रहो तुम
खुश रहे खुशी , खुश रहे गम .
63 - तुम ही तुम नज़र आते हो ,
तुम ये क्या कर गुज़र जाते हो।
64 - देखी हैं आईने की कुछ हसरतें बेपनाह,
रोज़ रोज़ ये आईना भी तो बदल नही सकता .
65 - कभी कभी ही उभरते हैं ये जज़्बात दिल के कोने में,
मैं थोड़ा थोड़ा और मतलबी हो जाता हूँ .
66 - कितना वक़्त परोसा है ज़िंदगी की थाली में ,
तेरा इंतज़ार है के कम ही नही होता .
67 - इतना लड़ना क्या काफ़ी नही है ,
जीत तुम्हारी तय रक्खी है .
68 - चुप रहकर कई बातें जब चीख चीख कर चिल्लाती हैं,
तो उन आवाज़ों पर बहुत तरस आता है, जो कभी कुछ बोल ही ना पाए.
तो उन आवाज़ों पर बहुत तरस आता है, जो कभी कुछ बोल ही ना पाए.
69 - मैं तो निकला हूँ एक मंज़िल की तलाश में,
रास्ते अगर हैरान करे तो किसी का कुसूर क्या ?
70 - बहुत बार हारने के बाद पता चला,
जीतना बहुत ज़रूरी है .
71 - सिमट रहा हूँ तेरे वज़ूद में ,
यकीन अब ना दिला पाऊँगा .
72 - अब के खुश रहना ,
दुखों के भी साथ ,
अब के क्यों
पहेलियों में उलझाए रखें खुद को.
73 - तुझे अपने साए में छुपा लूँ ,
आ बचा लूँ खुद से तुझको मैं .
74 - ख्वाब अब के रातों के चाँद खोद लायेंगे ,
अंधेरा दरमियाँ रखना , सुबह हो ना पाए बस !
75 - छुप के रहते हैं नज़र नही आते ,
ख़याल बनना कोई उनसे सीखे
72 - अब के खुश रहना ,
दुखों के भी साथ ,
अब के क्यों
पहेलियों में उलझाए रखें खुद को.
73 - तुझे अपने साए में छुपा लूँ ,
आ बचा लूँ खुद से तुझको मैं .
74 - ख्वाब अब के रातों के चाँद खोद लायेंगे ,
अंधेरा दरमियाँ रखना , सुबह हो ना पाए बस !
75 - छुप के रहते हैं नज़र नही आते ,
ख़याल बनना कोई उनसे सीखे
76 - ज़िंदगी है , ज़िंदगी में ,
लोग आए चले गये ,
कुछ को छाँटने में वक़्त लगा ,
कुछ छँटते ही चले गये .
77 - ये दुआएं ग़लत ये सजायें ग़लत ,
उसके नाम की उड़ रही हैं अफवायें ग़लत ,
वो ग़लतियाँ थी ग़लत तो होनी ही थी ,
क्यूँ मिल रही है ग़लतियों को सज़ायें ग़लत .
78 - हाथ की लकीरें थी ,झूठ बोल रही थी ,
भला किस्मत में भी अब कौन भरोसा करे .
79 - अगर मैने कहा था तो तुम्है चले ही जाना था ,
मेरे बस का जो वक़्त था, वो भी तो चला गया .
80 - मैने चुप्पी बाँधी थी ,
खामोशी फिर भी बोल पड़ी.
90 - तुम जो बदले हो अब की बारी ,
मौसमों का बदलना , बदलना नही लगता .
92 - कोहरे में डूबी दिशाओं से
जानना था
रास्ते का पता ,
मंज़िल का असर ,
हुआ यूँ वाक़या के
कोहरा भी छट गया .
93 - हवाओं पे फ़ैसला छोड़ दिया है ,
अबके मंज़िल, आसमान ज़रूर चूमेगी .
94 - मेरा भी कत्ल हुआ तेरे साथ साथ
मेरी चुप्पी में तेरा शोर बहुत है .
95 - मैं ना रुकता तो तुम भी नही रुकते ,
इसलिए मैने वक़्त को ही रोक लिया .
96 - शहर की आबो हवा रास आ गयी
अपना गाँव भूल जाने में वो कामयाब हुआ .
99 - तुझे अपने साए में छुपा लूँ ,
आ बचा लूँ खुद से तुझको मैं
100 -मुश्किल से मुश्किलों को थामा है ,
लोग आए चले गये ,
कुछ को छाँटने में वक़्त लगा ,
कुछ छँटते ही चले गये .
77 - ये दुआएं ग़लत ये सजायें ग़लत ,
उसके नाम की उड़ रही हैं अफवायें ग़लत ,
वो ग़लतियाँ थी ग़लत तो होनी ही थी ,
क्यूँ मिल रही है ग़लतियों को सज़ायें ग़लत .
78 - हाथ की लकीरें थी ,झूठ बोल रही थी ,
भला किस्मत में भी अब कौन भरोसा करे .
79 - अगर मैने कहा था तो तुम्है चले ही जाना था ,
मेरे बस का जो वक़्त था, वो भी तो चला गया .
80 - मैने चुप्पी बाँधी थी ,
खामोशी फिर भी बोल पड़ी.
90 - तुम जो बदले हो अब की बारी ,
मौसमों का बदलना , बदलना नही लगता .
92 - कोहरे में डूबी दिशाओं से
जानना था
रास्ते का पता ,
मंज़िल का असर ,
हुआ यूँ वाक़या के
कोहरा भी छट गया .
93 - हवाओं पे फ़ैसला छोड़ दिया है ,
अबके मंज़िल, आसमान ज़रूर चूमेगी .
94 - मेरा भी कत्ल हुआ तेरे साथ साथ
मेरी चुप्पी में तेरा शोर बहुत है .
95 - मैं ना रुकता तो तुम भी नही रुकते ,
इसलिए मैने वक़्त को ही रोक लिया .
96 - शहर की आबो हवा रास आ गयी
अपना गाँव भूल जाने में वो कामयाब हुआ .
99 - तुझे अपने साए में छुपा लूँ ,
आ बचा लूँ खुद से तुझको मैं
100 -मुश्किल से मुश्किलों को थामा है ,
आसानी से तो इन्है भी जाने ना दिया जाए ..
101 - खता किया कर ,
पर बता दिया कर .
पर बता दिया कर .
102 - गहरी गहरी रातों में जब सपने भी सो जाते हैं ,
मुझको जागना पड़ता है सपनों को जगाने के लिये .
103 - कद छोटा ही अच्छा होता है ,
ऊँचा देखने के लिये .
104 - चांदनी रात में दस्तखत है तुम्हारा ,
ये वही पुराना एक खत है तुम्हारा।
105 - शहर से दूर रहता है ,
मगर वो गांव से नहीं है।
106 - खुदी से वास्ता है तेरे लिये ,
बस यही रास्ता है तेरे लिए।
अंधरों ने जलाया था चराग़ ,कल रात की बात है ।
कल रात की बात है , रात को रात होने नहीं दिया गया ।
मुझको जागना पड़ता है सपनों को जगाने के लिये .
103 - कद छोटा ही अच्छा होता है ,
ऊँचा देखने के लिये .
104 - चांदनी रात में दस्तखत है तुम्हारा ,
ये वही पुराना एक खत है तुम्हारा।
105 - शहर से दूर रहता है ,
मगर वो गांव से नहीं है।
106 - खुदी से वास्ता है तेरे लिये ,
बस यही रास्ता है तेरे लिए।
107 - यूँ हो के किसी मंदिर में अज़ान हो जाये यूँ हो के किसी मस्ज़िद में शंख नाद हो जाये ।
ये जो फ़र्क बगावत के बुन लिए हैं सबने,
सांसें क्यों ना मज़हब से परे हो जाये ।
ये जो फ़र्क बगावत के बुन लिए हैं सबने,
सांसें क्यों ना मज़हब से परे हो जाये ।
108 - उसको नफरत है के मुझसे प्यार नहीं।
109 - अंधरों ने चरागों से जो बातें की सुनी तुमने ?
रात भर चाँद भी हैरां था अपने उजाले से ,अंधरों ने जलाया था चराग़ ,कल रात की बात है ।
कल रात की बात है , रात को रात होने नहीं दिया गया ।
110 - मैंने हिसाब से नियम बनाये थे ,
उसने नियम से हिसाब तोड़ दिया।
111 - जो ज़रूरी था वो ज़रुरत ने बदल दिया।
112 - जंग में जंग न लगे ,
इसलिए जंग जारी है।
113 - बस यहीं तलक सच है के तेरा वज़ूद है क़ायम ,
गुज़र जाने के बाद फिर कहाँ साँसों का इल्म होता है ।
114 - तुमने राहों में जो कांटे बिछा रक्खे हैं ,
उन्हें हमने फूलों का दर्ज़ा दिया है।
115 - वक़्त बे वक़्त ,वक़्त से मिला करो ,
जाने कौन सा वक़्त , वक़्त पे आ जाये ।
116 - रात की तस्वीर बना ली है ,
बहुत रातों से लड़ झगड़ के।
117 - ये मोल भाव से खरीद लेते हो जो जज़्बात तुम
इनमें भी महंगाई की मार पड़ती होगी ना।
118 - समंदर ने सिखाया गहरा रहना ,
मगर कितना ? ये नहीं पता।
119 - यादों के दस्तवेज़ों में ,
एक पुराणी नज़्म मिली है।
120 - किनारे में जो मिलता है वो सहरा याद करता है ,
समंदर कितना गहरा था ? वो पहरा याद करता है।
121 - जान के ख़ुद को , तुझको जाना ,
जान के तुझ को , खुदको जाना ।
122 - महज़ इतना ही इत्तेफ़ाक़ था ,
बस इत्तेफ़ाक़ था।
123 - कहानियां बदलती नहीं ,
जब किरदार बदलते हैं ,
तो बुरा लगता है।
124 - कभी कभी गलतफमियां भी इंसान को बड़ा बना देती हैं ,
इसमें गलत क्या है।
124 - चल के बादलों के पास चलें
ये ज़मीं तो लोगों की है ,
सुना है आसमान किसी का नहीं होता।
125 - सफर की बात करता है मगर हमसफ़र नहीं है वो ,
सज़र का टूटना कोई आके मुझसे पूछ ले।
126 - नींद का मानना है के रात सुबह तक होगी।
बस इत्तेफ़ाक़ था।
123 - कहानियां बदलती नहीं ,
जब किरदार बदलते हैं ,
तो बुरा लगता है।
124 - कभी कभी गलतफमियां भी इंसान को बड़ा बना देती हैं ,
इसमें गलत क्या है।
124 - चल के बादलों के पास चलें
ये ज़मीं तो लोगों की है ,
सुना है आसमान किसी का नहीं होता।
125 - सफर की बात करता है मगर हमसफ़र नहीं है वो ,
सज़र का टूटना कोई आके मुझसे पूछ ले।
126 - नींद का मानना है के रात सुबह तक होगी।
दनी रात में दस्तख़त है तुम्हारा , ये वही पुराना एक ख़त है तुम्हारा ।चाँदनी रात में दस्तख़त है तुम्हारा , य
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