
खून-ओ-ख़राब की ये चिंगारियाँ कम कीजिये,
सुलग रही है आग अब आंधियां कम कीजिये.
जन्नत की रहगुज़र आसान हो जायेगी,
अमीर और गरीब की दूरियां कम कीजिये.
अब मुश्किलों के पार निकलना है गर,
अपने पास रखी मजबूरियां कम कीजिये.
हर इक पल अनमोल है ज़िन्दगी की राह में,
गुज़र रहे वक्त की बरबादियाँ कम कीजिये.
क्योँ किसी गरीब की शम्मा बुझानी चाहिए?
उछलते हुए पत्थरों की गिनतियाँ कम कीजिये.
धर्म की दीवारों में रंग पुतवाया है कितना,
हिंदू और मुस्लिम की बारीकियां कम कीजिये.
खून से लगने लगे हैं मुझको ये रंगीन धब्बे,
कत्ल की आईने सी स्याहियां कम कीजिये.
काट दो नफरत की शाखें, फूल खिलने चाहिए,
खार सी चुभती है जो खामोशियाँ कम कीजिये.
सुलग रही है आग अब आंधियां कम कीजिये.