Tuesday, November 17, 2009

हत्याकांड


कल के अखबार में

खबर छ्पी थी

हो गया है

एक हत्याकान्ड ,

खूब चर्चा में है वो

जो मर चुका है

कैसे उसे मारा गया ?

क्यों उसे मारा गया ?

फोटो भी छ्पी है उसकी

और रोते हुए उसके रिश्तेदारों की

भीड़ है लोगों की

और सुना है केस अदालत तक जायेगा

फ़ैसला वहीं होगा

देखिये !

क्या पता वो लौट आये ?




Friday, November 6, 2009

विवशता



मेरी विवशता पर तुम अंकुश मत लगाओ

ये मेरी विवशता ही मेरी जीत है ।

मैं विवश हूँ मैं हार नही सकता ,

मैं समझ नही पा रहा ,

मेरा साथ कोई देना नही चाह रहा

या

मैं ही किसी को अपना नही पा रहा ।

अंत मैं

मैं अपनी विवशता का हाथ पकड़े

निकल पडुंगा मंज़िल की ओर ,

ना तुम रोक पाओगे,

और ना मैं ही रुक सकुंगा ।

ऐसे वक्त के खंडहर में

एक कमरा है मेरा

जहाँ विवशता के जालों में ,

में मकड़ी की तरह

अपना घर बुनता हूं

में अपना एक शहर बुनता हूं

पर

तुम मेरी विवशता पर अंकुश मत लगाना,

ये विवशता ही मेरी जीत है ।

ग़ज़ल - तमन्ना

कोई तमन्ना मेरे दिल में संभल गई है ,
मेरे ख्यालों में अब तुम्हारा दबाव कम है ।

नज़र की मैली नफरतों से ढक चुका हूँ ,
बह रहा था जो हद से ज्यादा लगाव कम है ।

हज़ार मोडों में मुड़ के मैंने देख लिया है ,
मेरी सड़क में अब तुम्हारा रिसाव कम है ।

हर एक मौसम खिजा का मौसम मेरे शहर में ,
मेरी वज़ह में अब तुम्हारा झुकाव कम है ।

बातें

कोरे पन्ने पर लिखी बातें ,
मेरे दिमाग पर टिकी बातें ,
उफ़ ! ये माहौल पर सजी बातें ,
झूठे तसव्वुर पर अडी बातें ,
मेरे टेबल पर पड़ी बातें ,
बातें
कलम की स्याही पर भरी बातें ,
ग़म की दहलीज पर खडी बातें ,
बीते कल की रही बातें ,
यूँ ही तनहा पली बातें ,
तुम्हारे न होने से कितना कुछ है
तुम होगे तो एक बात और सही .....

Thursday, November 5, 2009

एक एकड़ आसमान लेकर


मैं घर बनाऊंगा
एक एकड़ आसमान लेकर
घर में सपनों की चिनाई बहुत पक्की होगी
उन्हें हकीकत नही होने दूंगा
नही तो दीवार टूट जायेगी
घर बिखर जाएगा ।
मैं घर बनाऊंगा

एक एकड़ आसमान लेकर

एक एकड़ आसमान लेकर ।
हवावों सा रंग ही सही है दीवारों पर ,
सन्नाटों के दरवाज़े , खिड़की
सब अच्छे तो लगेंगे
प्रियतम तुम रहोगे ना संग मेरे
मैं घर बनाऊंगा
एक एकड़ आसमान लेकर ।
तुम कविता
तुम सुर
तुम चित्र हो एक उजाले सा
में तुमको सजाऊंगा घर में
हर कोना कोना सजा रहे
हर स्वप्न सलोना बचा रहे
में स्वप्न सजाऊंगा
एक अँधेरी रात को लेकर
हाँ में घर बनाऊंगा
एक
एकड़ आसमान लेकर ।

अक्षय बाफिला। 

ख्वाब


उस रात
बहुत तेज़ धूप थी
तुम्हारे मकान के ठीक सामने
जो आम का बगीचा है
वही अकेला खडा था मैं
और तुम झाँक रही थी घर की बालकनी से
तुम्हे वहम था
कहीं वो मैं तो नहीं  

और मुझे यकीन है
ये ख्वाब ही होगा ।

अक्षय बाफिला .

तुम्हारे लिए

में क्या दूँ तुम्हें
में तो हूँ ना !
ये लो ये ख्वाब मेरे , जहाँ रात तुम्हारी है।
ये लो ये अरमान मेरे , जहाँ तुम मेरे हो ।
ये लो ये पैगाम मेरे , तुम्हारे पते पर ।
ये लो इल्जाम मेरे सर पर , तुम्हारे ही लगाये हुए ।
ये लो ये मेहरबानियाँ , तुमसे ही हो गई थी ।
तुमसे अच्छा तुम्हारे लिए और क्या हो सकता है ?

क्या हो सकता है ?
में हूँ ना
तुम्हारे लिए ।


अक्षय बाफिला। 

पेशानी


जब से में दूर चला आया हूँ
बीते मंज़र बहुत करीब लगते हैं,
सारे अरमान बड़े अजीब लगते हैं,
भीनी धुंधलाहट है सच्चाई में
जैसे में कोहरे में कैद हूँ,
जैसे दूर कोई आता है लम्हे की तरह
बिना महसूस हुए चला भी जाता है.
बीते उम्र के लहजे से ये शिकायत न थी,
हाँ बीती उम्र में ये शरारत न थी,
न हर्फ़ थे , न लब्ज़ थे इतने तुले हुए,
के अब तो मेरे सारे एहसास भी गरीब लगते हैं,
सारे अरमान बड़े अजीब लगते हैं,
जब से में दूर चला आया हूँ
बीते मंज़र बहुत करीब लगते हैं,

के पेशानी से उठता है जीस्त-ऐ-जर्रा मेरा
में हूँ के वापस उसी मोड़ पे खडा हूँ…।

पेशानी - किस्मत
जीस्त - जिंदगी

अब आंधियां कम कीजिये




खून-ओ-ख़राब की ये चिंगारियाँ कम कीजिये,
सुलग रही है आग अब आंधियां कम कीजिये.

जन्नत की रहगुज़र आसान हो जायेगी,
अमीर और गरीब की दूरियां कम कीजिये.

अब मुश्किलों के पार निकलना है गर,
अपने पास रखी मजबूरियां कम कीजिये.

हर इक पल अनमोल है ज़िन्दगी की राह में,
गुज़र रहे वक्त की बरबादियाँ कम कीजिये.

क्योँ किसी गरीब की शम्मा बुझानी चाहिए?
उछलते हुए पत्थरों की गिनतियाँ कम कीजिये.

धर्म की दीवारों में रंग पुतवाया है कितना,
हिंदू और मुस्लिम की बारीकियां कम कीजिये.

खून से लगने लगे हैं मुझको ये रंगीन धब्बे,
कत्ल की आईने सी स्याहियां कम कीजिये.

काट दो नफरत की शाखें, फूल खिलने चाहिए,
खार सी चुभती है जो खामोशियाँ कम कीजिये.

सुलग रही है आग अब आंधियां कम कीजिये.

ग़ज़ल - कोई मिलेगा....


चल पड़ा हूँ रास्ते में , रहनुमा कोई मिलेगा.
में अकेला हूँ अभी , दर्मियाँ कोई मिलेगा.

इस नज़रिए की नज़र में , दूर तक कोई नही है.
न मिला कोई मुझे तो , फासला कोई मिलेगा.

बेफिक्र है क़दमों की आहट , चुप सुनाई देती नही,
टिकटिकी बांधे है लम्हा , बेखबर कोई मिलेगा.

जाने किसलिए है लाजिम वक्त की रफ्त्गी

राह के हर मोड़ पर बेनवा कोई मिलेगा।

चल पड़ा हूँ रास्ते में , रहनुमा कोई मिलेगा.

जिंदगी की तलाश जारी है.

जिंदगी की तलाश जारी है,
यूँ ही तनहा है यूँ गुजारी है.

डूब के जख़म में देखा मैंने,
घाव गहरा है या बीमारी है.

वैसे परदे का हिलना तो हुआ करता है,
हवावों का सफ़र भी अभी जारी है.

ऐसे में लगता है कोई आ के जाने लगा,
वहम आया था उसका , जाने की तैयारी है.

पलकें हिलती है सपने कहीं खो न जाएँ,
रात का भार भी तो बहुत भारी है.

खाली खाली शाम चली है

खाली खाली शाम चली है,
आवो कुछ नग्मात बुनें.
दिल के खुश रखने को यारो,
अपने कुछ जज़्बात बुनें.

दर्द कहाँ अब दर्द रहा है,
दर्द से अब कोई दर्द नहीं.
चोटें मरहम बन बैठी हैं,
हम किस झगडे की बात करें.
दिल के..............................................

फिर कहाँ ये दुनियादारी,
रिश्ते नाते और ये सब कुछ.
जीने की अब एक वजह है,
जीने के हालात बुनें.
दिल के.............................................

खाली खाली शाम चली है
पत्थर से यूँ बातें करना,
अब अपनी आदत ऐसी है.
पत्थर की एक मूरत ने बोला,
आवो कुछ एहसास बुनें.

दिल के खुश रखने को यारो,
अपने कुछ जज़्बात बुनें.

अक्षय बाफिला।