Monday, September 13, 2010

है ना माँ !

माँ याद है मुझे जब मैं बाल्टी के साइज़ का हुआ करता था,
मेरा एक हाथ बाल्टी में और दूसरा हाथ तेरे कंधे पे हुआ करता था,
तू गुनगुने पानी से नहलाया करती थी मुझे झूठी बातों का लालच देकर,
और मैँ  लालची , लालच में आ भी जाता था.तेरी गोद में मुझे सारा जहाँ नज़र आता था,
तेरी थपकीयों में एक अजीब सा सुकून था,
तेरी लोरियाँ मेरी नींदें हुआ करती थीऔर मेरी नींदों में भोले भाले सपने,
जाने कहाँ गया वो सब,
समय बहुत लालची है माँ
बदल दिया मुझे,
अब मैं  बाल्टी के साइज़ का नही रहा
लेकिन तू अब भी वही है,
है ना माँ !

अक्षय बाफिला