Thursday, August 26, 2010

नज़्म - वज़ूद


ढूँढते ढूँढते एक नज़्म की मानिंद
मिल ही जाती हो तुम
तुम्हारा वज़ूद है के
एक सफ़हे में सिमट जाता है,
में कैसे कहूँ के ये तू नहीं,
ये गुफ्तगू तेरे रूबरू नहीं.
क्या सबब हो के तुम हो कोरे पन्ने में,
वक़्त लगता है इंसान को खुदा बनने में.
तुम तो अब भी रूठे नज़र आते हो,
तुम्हारा एहतियात है जो
वो है फन मेरा
एक फनकार से पूछते हो
के जूस्तजू क्या है ?
के सिमट आई है देखो
हर तरफ से हवा
तुम्हारा वज़ूद है केएक सफ़हे में सिमट जाता है.

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