Wednesday, December 29, 2010
Saturday, December 25, 2010
ग़ज़ल- कुछ नये शेर
अब वहाँ जाकर के जिया जाएगा
जहाँ ज़िक्र तुम्हारा किया जाएगा.
हथेली की लकीरों पे भरोसा क्या करना
किस्मत का लिखा भी बदल दिया जाएगा.
इन उसूलों में भी अब वो समझ ना रही
ख़ुद उसूलों की तरह निभ लिया जाएगा.
खेल हवाओं के संग ही अच्छा होता है
खुद को हार के ही जीत लिया जाएगा.
जहाँ ज़िक्र तुम्हारा किया जाएगा.
हथेली की लकीरों पे भरोसा क्या करना
किस्मत का लिखा भी बदल दिया जाएगा.
इन उसूलों में भी अब वो समझ ना रही
ख़ुद उसूलों की तरह निभ लिया जाएगा.
खेल हवाओं के संग ही अच्छा होता है
खुद को हार के ही जीत लिया जाएगा.
Wednesday, December 22, 2010
धर्म
जिस जगह मैं रहता हूँ
रोज़ सुबह अज़ान की आवाज़ सुनाई देती है
अल्लाह की याद आ जाती है
इधर मेरा धर्म बोलता है
रोज़ मंदिर क्यूँ नही चले जाते
लेकिन मुझे कोई याद ही नही दिलाता
मेरे गुरु बोलते हैं
बहुत जल्द ईसा मसीह आने वाले हैं धरती पर
फिर ये दुनिया बदल जाएगी
लेकिन कब तक
उसका कुछ पता नही है
बहुत धर्मों का बोलबाला है यहाँ
मैं जानता हूँ तुम्हें भी एक मौका चाहिए.
फिर तुम भी उपदेश दिया करोगे
और मैं सुन नही पाऊँगा !
अक्षय बाफिला।
रोज़ सुबह अज़ान की आवाज़ सुनाई देती है
अल्लाह की याद आ जाती है
इधर मेरा धर्म बोलता है
रोज़ मंदिर क्यूँ नही चले जाते
लेकिन मुझे कोई याद ही नही दिलाता
मेरे गुरु बोलते हैं
बहुत जल्द ईसा मसीह आने वाले हैं धरती पर
फिर ये दुनिया बदल जाएगी
लेकिन कब तक
उसका कुछ पता नही है
बहुत धर्मों का बोलबाला है यहाँ
मैं जानता हूँ तुम्हें भी एक मौका चाहिए.
फिर तुम भी उपदेश दिया करोगे
और मैं सुन नही पाऊँगा !
अक्षय बाफिला।
Monday, December 20, 2010
एक खिड़की चाहिए
मैं नही माँगता हूँ
ट्यूब लाइट की चकाचोंध
इस शहर में
ये झोपड़ी ही मेरा बँगला है,
तुम देखना
इस बंगले में लगे बल्ब
जो जलते ही नहीं हैं,
एक दिन
तुम्हारे शहर में उजाला करेंगे,
मुझे झाँकने के लिए
बस एक खिड़की चाहिए.
Friday, December 10, 2010
त्रिवेणी
ऐसे खटखटाते हैं रात के सन्नाटे
जैसे ख्वाब के सब दरवाज़े टूट जायेंगे
और तुम चले जाओगे सहर से पहले.
जैसे ख्वाब के सब दरवाज़े टूट जायेंगे
और तुम चले जाओगे सहर से पहले.
Wednesday, December 1, 2010
एक नज़्म की कोशिश - वज़ूद
ढूँढते ढूँढते एक नज़्म के मानिंद
मिल ही जाती हो तुम
तुम्हारा वज़ूद है के
एक सफ़हे में सिमट जाता है
मैं कैसे कहूँ के ये तू नहीं
ये गुफ्तगू तेरे रूबरू नहीं
क्या सबब हो के तुम हो कोरे पन्ने में
वक़्त लगता है इंसान को खुदा बनने में
तुम तो अब भी रूठे नज़र आते हो
तुम्हारा एहतियात है जो
वो है फ़न मेरा,
एक फ़नकार से पूछते हो
जूस्तजू क्या है ?
के सिमट आई है देखो
हर तरफ से हवा
तुम्हारा वज़ूद है के एक
सफ़हे में सिमट जाता है.
मानिंद - तरह
सफ़हे - पन्ने
अक्षय बाफिला
मिल ही जाती हो तुम
तुम्हारा वज़ूद है के
एक सफ़हे में सिमट जाता है
मैं कैसे कहूँ के ये तू नहीं
ये गुफ्तगू तेरे रूबरू नहीं
क्या सबब हो के तुम हो कोरे पन्ने में
वक़्त लगता है इंसान को खुदा बनने में
तुम तो अब भी रूठे नज़र आते हो
तुम्हारा एहतियात है जो
वो है फ़न मेरा,
एक फ़नकार से पूछते हो
जूस्तजू क्या है ?
के सिमट आई है देखो
हर तरफ से हवा
तुम्हारा वज़ूद है के एक
सफ़हे में सिमट जाता है.
मानिंद - तरह
सफ़हे - पन्ने
अक्षय बाफिला
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