Monday, November 29, 2010

sms - ना जाने कितनी शिकायतों से भरा रहता था तेरा ख़त जैसे कोई नज़्म बाँध के मेरे कलेजे में चिपका दी हो तुमने

वो दौर था जब तुम ख़त लिखा करती थी
तुम्हारे ख़त में लिखे शब्दों से मैं
तुम्हारे हाथों की छुवन को महसूस कर लिया करता था
कभी कभी तुम्हारे आँसू के धब्बे
ख़त में स्याही बिखेर देते थे
मैं समझ जाता था तुम रोई होगी
मुझे याद करके
sms 
ना जाने कितनी शिकायतों से भरा रहता था तेरा ख़त
जैसे कोई नज़्म बाँध के मेरे कलेजे में चिपका दी हो तुमने
आजकल तुम sms foward कर देती हो
अच्छा नही लगता है.

अक्षय बाफिला। 

Thursday, November 18, 2010

मेरे गाँव की कमी है

मेरे गाँव की कमी है
के वो शहर नही है
वहाँ सड़कों पर रेड लाइट नही है
और चहल पहल नही है,
हाँ! ये मेरे गाँव की कमी है
मेरे गाँव में पेड़ों के हैं जंगल
जहां साँस लेती है ज़ॅमी
जहाँ जानवर जीते हैं
अपने हौसलों के साथ
मेरे गाँव में पत्थरों के जंगलों की कमी है
मकान तो हैं मगर
फ्लेट ही नहीं हैं
ये मेरे गाँव की कमी है.
जवान हौसलों में अब सीमेंट लग चुका
बन गई दीवारें ईंट ढक चुकी
जो पल रही थी जिंदगी
वो शहर को गयी
खा के दाना पानी गाँव का
शहर को गयी.
नौकर बनने का रिवाज़
अब भी चल रहा
मेरे गाँव में तो नौकरी भी नही है
ये मेरे गाँव की कमी है
वो शहर नही है
मेरे गाँवकी कमी है.

शायद, ख़याल, सोज़, तमन्ना और है.

शायद, ख़याल, सोज़, तमन्ना और है
मेरी ज़िंदगी का एक पन्ना और है.

ओढूं मैं क्यौ नकाब गुनहगार मैं नहीं,
मेरा ख़्याल हैं के मुझे बनना और है.

रूह-ए-अदा की रौनके महफूज़ तो करूँ,
चेहरे की झुर्रियों की तमन्ना और है.

दिल का जवाब आप से मुख़ातिब नही हुआ,
मेरा ख्याल है के संभलना ज़रूर है.

वक़्त यूँ चलता रहा चल रहा यूँ नसीब,
काँटों की रहगुज़ार में छालों का दौर है.