Thursday, November 18, 2010

शायद, ख़याल, सोज़, तमन्ना और है.

शायद, ख़याल, सोज़, तमन्ना और है
मेरी ज़िंदगी का एक पन्ना और है.

ओढूं मैं क्यौ नकाब गुनहगार मैं नहीं,
मेरा ख़्याल हैं के मुझे बनना और है.

रूह-ए-अदा की रौनके महफूज़ तो करूँ,
चेहरे की झुर्रियों की तमन्ना और है.

दिल का जवाब आप से मुख़ातिब नही हुआ,
मेरा ख्याल है के संभलना ज़रूर है.

वक़्त यूँ चलता रहा चल रहा यूँ नसीब,
काँटों की रहगुज़ार में छालों का दौर है.








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