Wednesday, December 1, 2010

एक नज़्म की कोशिश - वज़ूद

ढूँढते ढूँढते एक नज़्म के मानिंद
मिल ही जाती हो तुम
तुम्हारा वज़ूद है के
एक सफ़हे में सिमट जाता है
मैं कैसे कहूँ के ये तू नहीं
ये गुफ्तगू तेरे रूबरू नहीं
क्या सबब हो के तुम हो कोरे पन्ने में
वक़्त लगता है इंसान को खुदा बनने में
तुम तो अब भी रूठे नज़र आते हो
तुम्हारा एहतियात है जो
वो है फ़न मेरा,
एक फ़नकार से पूछते हो
जूस्तजू क्या है ?
के सिमट आई है देखो
हर तरफ से हवा
तुम्हारा वज़ूद है के एक
सफ़हे में सिमट जाता है.

मानिंद - तरह
सफ़हे - पन्ने

अक्षय बाफिला

3 comments:

  1. तुम्हारा वज़ूद है के एक
    सफ़हे में सिमट जाता है.

    बहुत सुन्दर पंक्तियाँ।

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  2. बेहद ख़ूबसुरत कोशि‍श है...!

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  3. Thanku so much Vandna ji and Uttamrao ji :)

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