Tuesday, December 4, 2018

आज़ाद हो तुम ।

जाओ के पंछियों को अपना दोस्त बना लो ,
जाओ के पेड़ों की शाखों को नशेमन बना लो ।
ये घरोंदों में तुम्हें क्यों कैद रहना है ? 
इन झगड़े फसादों से क्या उम्मीद है तुम्हें,
 बांध के रक्खी हैं जो बेड़ियाँ तुमने ,
तोड़ दो , 
अब साँसों को भी सांस लेने दो ,
एक नये बदलाव का आगाज़ हो तुम ,
ये धरती आसमां और सारा जहां हो तुम ,
क़ैद को भी अब फ़िक्र है तुम्हारी ,
उड़ जाओ , उड़ जाओ ,
आज़ाद हो तुम ।

अक्षय बाफिला।  
आज़ाद हो तुम

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