मैं बिखर रहा था
अपने सबूत बटोरते बटोरते,
हक़ के दरवाज़ों में
कोई ताला लगाकर
जाने चाबी कहाँ गुम कर आया है ?
एक और काम मुझे सौंप गया
के ढूँढ लाऊं मैं तमन्नाओं से भरी वो चाबी.
जैसे इस खंडहर में ना जाने
कितनी मंज़िलें बिखरी पड़ी हुई हैं .
अक्षय बाफिला।
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| हक़ के दरवाज़े |
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