Saturday, January 5, 2019

ठंडा दिसम्बर याद आता है।

सर्दियों से गुज़रता हुआ वो मंज़र याद आता है ,
पहाड़ों  का  वो  ठंडा  दिसम्बर  याद  आता  है।

ठण्ड से ठिठुर कर और अलाव के बहुत करीब,
लकड़ियां बदलने का अपना नंबर याद आता है।

फूंकनी  में  जो  हवा  संग  गुज़रती  हैं  साँसें ,
ठंडी  आंच  का फिर  सुलगना  याद  आता  है।

अक्षय बाफिला।

दिसम्बर याद आता है। 


Sunday, December 9, 2018

अंत बिंदु .



कहाँ ढूढ़ुँ कहाँ खोजुं भावना का अंत बिंदु ,
मेरे मन की स्थिरता का माँगता हूँ अंत बिंदु .

शून्य से शुरूवात का स्राव कैसे रुकेगा,
बीज की अस्थिरता का चाहता हूँ अंत बिंदु.

थके हुए मार्गों का विश्राम पटल खोल दो,
मैं पगों की प्यास का ढूंढता हूँ अंत बिंदु.

जीवन् की परिधि में कहाँ मृत्यु का निवास हो,
व्रत के तो चारों ओर घूमता है अंत बिंदु.

अक्षय बाफिला। 

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Friday, December 7, 2018

ग़ज़ल

उसको खुद में भरा-भरा देखा
मैने खुद को ज़रा-ज़रा देखा.

ये भी तजरुबा ज़िंदगी में हुआ
मैने सौदा खरा खरा देखा.

ये हमारे ग़म का दरख़्त सही,
कम से कम हरा भरा देखा.

लम्हे कटते हैं जैसे क़त्ल हुआ
वक़्त का जी भरा भरा देखा.

बहते दरिया का दिल दहला होगा,
चाँद का अक्स जो खुरदुरा देखा.

अक्षय बाफिला। 
ग़ज़ल

Wednesday, December 5, 2018

जज़्ब जज़्बात बदलने लगे हैं।

जज़्ब जज़्बात बदलने  लगे हैं ,
अबके हालात बदलने लगे हैं।

वो तो ख्वाहिश में रूठ जाता है ,
अब के ख्वाहिश बदलने लगे हैं।

हम  रहें  या  न  रहें  खुद  में ,
तुम में खुद को बदलने लगे हैं।

एक  तस्वीर  पुरानी  दिखाई देती है ,
नयी तस्वीर में जब से ढलने लगे हैं।

आसमान इतना खुला कभी भी न था ,
ज़मीं  में  बादलों  से  लड़ने  लगे  हैं।

अक्षय बाफिला।

जज़्ब जज़्बात बदलने  लगे हैं

Tuesday, December 4, 2018

आज़ाद हो तुम ।

जाओ के पंछियों को अपना दोस्त बना लो ,
जाओ के पेड़ों की शाखों को नशेमन बना लो ।
ये घरोंदों में तुम्हें क्यों कैद रहना है ? 
इन झगड़े फसादों से क्या उम्मीद है तुम्हें,
 बांध के रक्खी हैं जो बेड़ियाँ तुमने ,
तोड़ दो , 
अब साँसों को भी सांस लेने दो ,
एक नये बदलाव का आगाज़ हो तुम ,
ये धरती आसमां और सारा जहां हो तुम ,
क़ैद को भी अब फ़िक्र है तुम्हारी ,
उड़ जाओ , उड़ जाओ ,
आज़ाद हो तुम ।

अक्षय बाफिला।  
आज़ाद हो तुम

Monday, December 3, 2018

मुश्किलों से मशवरा रखना होगा

मुश्किलों से मशवरा रखना होगा ,
तुमको भी तजरूबा रखना होगा।

वो शख्स तेरा अपना ही तो है ,
सम्हाल कर फैसला रखना होगा।

कोई आदत बदल दी हो गर उसने ,
सामने चेहरे के आईना रखना होगा।

उँगलियों में जो महीने गिने हैं
हमने ,
सदियों तक सिलसिला रखना होगा।

अक्षय बाफिला।
मुश्किलों से मशवरा रखना होगा

Thursday, November 29, 2018

बस एक बात का झगड़ा है और कुछ भी नहीं .


बस एक बात का झगड़ा है और कुछ भी नहीं ,
जज़्बात का झगड़ा है और कुछ भी नहीं ।

रुख़सती   रुख़   में  दिखाई  देने  लगे   जब ,
कुछ तो मालूमात का झगड़ा है और कुछ भी नहीं ।

किसके कहने से ज़माने ने बदले हैं अपने तेवर ?
ये कुछ खासमखास का पहरा है और कुछ भी नहीं ।

एक मुलाक़ात में कौन किसी का होता है ,
कुछ मुक़म्मल हुआ है और कुछ भी नहीं ।

दायरे    दायरों     में     रहने     दो ,
फ़ासलों का फैसला है और कुछ भी नहीं ।

अक्षय बाफिला .
बस एक बात का झगड़ा है और कुछ भी नहीं