Saturday, January 5, 2019

ठंडा दिसम्बर याद आता है।

सर्दियों से गुज़रता हुआ वो मंज़र याद आता है ,
पहाड़ों  का  वो  ठंडा  दिसम्बर  याद  आता  है।

ठण्ड से ठिठुर कर और अलाव के बहुत करीब,
लकड़ियां बदलने का अपना नंबर याद आता है।

फूंकनी  में  जो  हवा  संग  गुज़रती  हैं  साँसें ,
ठंडी  आंच  का फिर  सुलगना  याद  आता  है।

अक्षय बाफिला।

दिसम्बर याद आता है। 


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